Saturday, 9 April 2016
Friday, 8 April 2016
Chaitra Navratri 2016 - शैलपुत्री देवी
देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं। दुर्गाजी पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के नाम से जानी जाती हैं।
ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधार' चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।
शोभा
वृषभ-स्थिता इन माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। तब इनका नाम 'सती' था। इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था।
कथा
एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।
अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'
शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।
सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं।
केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।
परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे।
यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।
वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया।
वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।
सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।
उपसंहार
'शैलपुत्री' देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।
Tuesday, 22 March 2016
परम आराध्या करुणामयी “श्री मैया लक्ष्मी देवीजी” – 23 मार्च अवतरण दिवस
लगभग सभी के मन में महापुरुषों के उपदेशों के साथ-साथ उनके जीवन के विषय में विस्तार से जानने की उत्सुकता भी रहती है। बहुतांश भक्तों ने पूजनीय लक्ष्मी मैयाजी के पावन दर्शनों का लाभ तो प्राप्त किया है किन्तु उनके साधनामय जीवन से वे अनभिज्ञ हैं। प्रस्तुत हैं "श्री मैयाजी" के कठोर साधनामय जीवन के कुछ अंश "ज्ञान की गहराई" नामक पुस्तक से।
Wednesday, 16 March 2016
Pradhan Times : Pranab Mukherjee: Amendments in Law
Justice is not Justice if it violates the Principles of Justice
न्याय व्यवस्था में जल्द सुधार लाया जाये - राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी
Tuesday, 15 March 2016
Food for Thought : 11 संस्कृति रक्षक प्राणायाम करके अपना संकल्प वातावरण में फेको। इसमें विश्व मानव का मंगल है।
Food For Thought by #AsharamBapuJi
Monday, 14 March 2016
Wednesday, 9 March 2016
Pradhan Times: Know the Truth about POCSO Act?
#MisuseOfRapeLaws No Act or Law can punish an INNOCENT but POSCO Act is an exception. A major girl proved herself minor by hook or by crook and falsely accused an Innocent Saint. The Saint who has not done anything wrong, is in the prison and will have to prove that he is not guilty. What a pity? For more details must read - PRADHAN TIMES, HARIDWAR.
कोई भी कानून या अधिनियम एक निर्दोष को सजा नहीं दे सकता लेकिन पोक्सो एक्ट इसका अपवाद है। एक बालिग लड़की ने अपने को कैसे भी करके नाबालिग साबित कर एक निर्दोष संत पर झूठा आरोप लगाया और वह संत जिन्होने कुछ गलत किया ही नहीं जेल में हैं और उन्हें साबित करना पड़ेगा कि वह दोषी नहीं है। कितने दु:ख की बात है। पढ़िये विस्तार से - प्रधान टाइम्स, हरिद्वार।



