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Monday, 3 July 2017

Devshayani Ekadashi

देवशयनी एकादशी - 4 जुलाई

आषाढ़ शुक्ल एकादशी को “देवशयनी एकादशी” कहते हैं। भगवान नारायण इस दिन से चार मास तक क्षीर सागर में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इसीलिये इस दिन को 'देवशयनी'  कहा जाता है। इस काल (चतुर्मास) में यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, ग्रहप्रवेश, गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म है, वे सभी त्याज्य होते हैं।

एक बार देवऋषि नारदजी ने ब्रह्माजी से इस एकादशी के विषय में जानने की उत्सुकता प्रकट की, तब ब्रह्माजी ने बताया – “ सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी किंतु भविष्य में क्या हो जाये, यह कोई नहीं जानता। अतः वे भी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके राज्य में शीघ्र ही भयंकर अकाल पड़ने वाला है। उनके राज्य में पूरे तीन वर्ष तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा। इस दुर्भिक्ष (अकाल) से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। धर्म पक्ष के यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा - व्रत आदि में कमी हो गई। प्रजा ने राजा के पास जाकर गुहार लगाई।

राजा तो इस स्थिति को लेकर पहले से ही दुःखी थे। वे सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौन  सा पाप - कर्म किया है, जिसका दंड मुझे इस रूप में मिल रहा है? इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन जानने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए। वहाँ विचरण करते - करते एक दिन वे ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुँचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। ऋषिवर ने आशीर्वचनोपरांत कुशल क्षेम पूछा। फिर जंगल में विचरने व अपने आश्रम में आने का प्रयोजन जानना चाहा।

तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा- 'महात्मन्‌! सभी प्रकार से धर्म का पालन करता हुआ भी मैं अपने राज्य में दुर्भिक्ष देख रहा हूँ। आखिर किस कारण से ऐसा हो रहा है, कृपया इसका समाधान करें।' यह सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा- 'हे राजन! सब युगों से उत्तम यह सतयुग है। इसमें छोटे से पाप का भी बड़ा भयंकर दंड मिलता है। इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है। ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है जबकि आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। यही कारण है कि आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक वह काल को प्राप्त नहीं होगा, तब तक यह दुर्भिक्ष शांत नहीं होगा। दुर्भिक्ष की शांति उसे मारने से ही संभव है।' किंतु राजा का हृदय एक निरपराध शूद्र तपस्वी का शमन करने को तैयार नहीं हुआ। उन्होंने कहा- “ हे देव ! मैं उस निरपराध को मार दूँ, यह बात मेरा मन स्वीकार नहीं कर रहा है। कृपा करके आप कोई और उपाय बताएँ।“ महर्षि अंगिरा ने कहा – “ आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी।“

राजा अपने राज्य की राजधानी लौट आये और चारों वर्णों सहित ‘देवशयनी एकादशी’ का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन -धान्य से परिपूर्ण हो गया।

देवशयनी एकादशी का महात्मय पूज्य बापूजी की मधुर वाणी में अवश्य सुनें:

Tuesday, 12 July 2016

Chaturmas - 15 July to 11 November 2016

चतुर्मास - 15 जुलाई से 11 नवम्बर

1. चतुर्मास में भगवान नारायण एक रूप में तो राजा बलि के पास रहते हैं और दूसरे रूप में शेष शय्या पर शयन करते हैं, अपने योग स्वभाव में, शांत स्वभाव में, ब्रह्मानन्द स्वभाव में रहते हैं।  अत: इन दिनों में किया हुआ जप, संयम, दान, उपवास, मौन आदि विशेष हितकारी, पुण्यदायी व सफलतादायी होते हैं।

2. चतुर्मास में दीपदान अर्थात आश्रम, मंदिर, गंगाजी का तट, पीपल के नीचे अथवा घर पर दीपक जलाने से बुद्धि, विचार और व्यवहार में ज्ञान – प्रकाश की वृद्धि होती है, दीपदान करने का फल भी होता है।

3. बिल्वपत्र (बेल के पत्ते) के जल से स्नान करना पापनाशक व प्रसन्नतादायक होता है। बिल्वपत्र बाल्टी में डाल दें। पाँच बार “ॐ नम: शिवाय” का जप करके फिर पानी सिर पर डालें तो पित्त की बीमारी, कंठ का सूखना कम होगा तथा चिड़चिड़ा स्वभाव भी कम हो जायेगा।

4. चतुर्मास में पाचनतंत्र दुर्बल होता है अत: खानपान सादा, सुपाच्य होना चाहिये। इन दिनों पलाश की पत्तल पर भोजन करने वाले को एक-एक दिन एक-एक यज्ञ करने का फल होता है। पलाश के पत्तल पर भोजन बड़े-बड़े पातकों का नाश करता है व ब्रह्मभाव को प्राप्त कराने वाला होता है।

5. चतुर्मास में निंदा न करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें, किसी भी स्त्री पर बुरी नज़र न डालें, संत दर्शन, सत्संग श्रवण, संतों की सेवा तथा भ्रूमध्य में ‘ ॐकार ’ का ध्यान करने से बुद्धि का अद्भुत विकास होता है। मिथ्या आचरण का त्याग कर जप अनुष्ठान करें तो ब्रह्मविद्या का अधिकार मिल जाता है।