In the Bhagwat, Bhagwan Krishna says - "O Udhava! Neither yoga nor knowledge, nor the recitation of scriptures, nor even austerities or renunciation or social service or charities or worship or learning, neither going to holy places, nor controlling the senses leads one to me as easily or as speedily as through SATSANG or through the association of the holy men."
Tuesday, 30 August 2016
Monday, 29 August 2016
If not in Human Birth then WHEN?
Food for Thought by H. D. H. Asharam Bapu Ji
"Silence your mind and listen the Divine Voice...OM"
Sunday, 28 August 2016
Ajaa Ekadashi
अश्वमेघ यज्ञ का फल देने वाली - अजा एकादशी (28 अगस्त)
युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार श्रावण) मास के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया बताइये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! एकचित्त होकर सुनो । भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अजा’ है । वह सब पापों का नाश करने वाली बतायी गयी है । भगवान ह्रषीकेश का पूजन करके जो इसका व्रत करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । पूर्वकाल में हरिश्चन्द्र नामक एक विख्यात चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी और सत्यप्रतिज्ञ थे । एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर उन्हें राज्य से भ्रष्ट होना पड़ा । राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया । फिर अपने को भी बेच दिया । पुण्यात्मा होते हुए भी उन्हें चाण्डाल की दासता करनी पड़ी । वे मुर्दों का कफन लिया करते थे । इतने पर भी नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र सत्य से विचलित नहीं हुए । इस प्रकार चाण्डाल की दासता करते हुए उनके अनेक वर्ष व्यतीत हो गये । इससे राजा को बड़ी चिन्ता हुई । वे अत्यन्त दु:खी होकर सोचने लगे: ‘क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा उद्धार होगा?’ इस प्रकार चिन्ता करते-करते वे शोक के समुद्र में डूब गये ।
राजा को शोकातुर जानकर महर्षि गौतम उनके पास आये । श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपने पास आया हुआ देखकर नृपश्रेष्ठ ने उनके चरणों में प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़ गौतम के सामने खड़े होकर अपना सारा दु:खमय समाचार कह सुनाया । राजा की बात सुनकर महर्षि गौतम ने कहा : ‘राजन् ! भादों के कृष्णपक्ष में अत्यन्त कल्याणमयी ‘अजा’ नाम की एकादशी आ रही है, जो पुण्य प्रदान करनेवाली है । इसका व्रत करो । इससे पाप का अन्त होगा । तुम्हारे भाग्य से आज के सातवें दिन एकादशी है । उस दिन उपवास करके रात में जागरण करना ।’ ऐसा कहकर महर्षि गौतम अन्तर्धान हो गये ।
मुनि की बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र ने उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया । उस व्रत के प्रभाव से राजा सारे दु:खों से पार हो गये । उन्हें पत्नी पुन: प्राप्त हुई और पुत्र का जीवन मिल गया । आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं । देवलोक से फूलों की वर्षा होने लगी । एकादशी के प्रभाव से राजा ने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया और अन्त में वे पुरजन तथा परिजनों के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये ।
राजा युधिष्ठिर ! जो मनुष्य ऐसा व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो स्वर्गलोक में जाते हैं । इसके पढ़ने और सुनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है ।
Friday, 26 August 2016
Janmashtami Celebrations at AshramHaridwar
कल "जन्माष्टमी" के पावन पर्व पर हरिद्वार आश्रम में बच्चों द्वारा "राधाकृष्ण" एवं "गोप-गोपियों" के रूप में एक नाटिका प्रस्तुत की गई जिसमें बच्चों ने मटकी फोड़ी व नृत्य किया। इसके पश्चात् बच्चों ने पूज्य बापूजी की आरती करी और प्रसाद पाया। कार्यक्रम के अंत में बच्चों को नोटबुक व पेन वितरित किये गये।
Wednesday, 24 August 2016
25 August - Krishna Janmashtami
सर्व फलदायक जन्माष्टमी व्रत - 25th अगस्त
Monday, 22 August 2016
जब कुल्हाड़ी भी चंदन की सुवास महकाने लगी
एक व्यक्ति देश, धर्म, संस्कृति और संतों की खूब निंदा करता था। उसने अपनी टोली बना ली थी एवं भगवद्भक्तों, सज्जनों को व्यर्थ ही सताता था। यदि किसी को तामसी प्रकृति कैसी होती है यह देखना हो तो बस उसी को देख ले। राक्षसी एवं मोहिनी प्रकृति का मानो वह मूर्तिमान स्वरूप था। एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ विचरण करते हुए उस क्षेत्र में पहुँचे । त्राहिमाम्……त्राहिमाम् पुकार रहे लोगों ने उन्हें अपनी व्यथा बतायी । महात्मा अपने शिष्यों से बोले :
‘‘ऋषिकुमारो ! मैंने तुम्हें जो शिक्षा दी है, उसको व्यवहार में लाने का समय अब आ गया है । तुम लोग मिलकर इन लोगों की व्यथा दूर करो।“
शिष्य उस क्षेत्र में जाकर सत्प्रचार करने लगे परंतु वे जहाँ भी जाते निंदकों की टोली के लोग नशा करके वहाँ आ जाते और उन्हें गालियाँ देते, अनर्गल वचन बोलते, यहाँ तक कि पत्थर भी मारते । कुछ ही दिनों में सभी शिष्य वापस आये और महात्मा से बोले : ‘‘गुरुजी ! हमने खूब प्रयास किये मगर निंदकों की वह टोली और उनका वह मुखिया... मानो हमारे धैर्य की परीक्षा लेने की ठान बैठे हों । वे सर्वहितकारी सनातन संस्कृति की जडें उखाडने का प्रण ले बैठे हैं।“
महात्मा बोले : ‘‘मैंने तुम्हें चंदन बनने की शिक्षा दी है । जो कुल्हाडी चंदन को काटती है, वह भी समय पाकर सुगंधित हो जाती है । कंचन की ही अग्नि - परीक्षा ली जाती है । धैर्य की कठिन कसौटी पर खरे उतरनेवालों को ही ‘धीर’ पद (अडिग आत्मपद) की प्राप्ति होती है । जब वे लोग बुराई का मार्ग नहीं छोड रहे हैं तो तुम भलाई का मार्ग बीच में ही छोडकर वापस कैसे आ गये ? क्या कभी बुराई भलाई से अधिक बलशाली हो सकती है ? आर्यवीरों ! मुझे विश्वास है दृढता के मामले में तुम उनसे कदापि कम नहीं साबित हो सकते ! अपनी महिमा में जागो !”
शिष्यों की अंतरात्मा जागृत हुई । वे आपस में चर्चा करने लगे कि ‘‘एक अकेले निगुरे व्यक्ति और उसकी टोली में ऐसी दृढता हो सकती है तो ऐसे महान गुरु के हम शिष्यों में कितनी होनी चाहिए ! हमारे गुरुदेव ने कितनों का जीवन परिवर्तित किया है तो हम उनके सिद्धांतों की ध्वजा ऐसे क्षेत्र में भी क्यों नहीं फहरा सकते! अब हमें सफलता पाने तक मैदान नहीं छोडना है।"
“ बाधाएँ कब बाँध सकी हैं पथ पे चलनेवालों को।
विपदाएँ कब रोक सकी हैं आगे बढने वालों को।।“
वे दोबारा उस क्षेत्र में गये और वहाँ देहभान भूलकर, निर्भय हो कर ऐसे तो अपने गुरु के सिद्धांत के सत्प्रचार में जुट गये मानो सिद्धांतमय हो गये । जैसे चट्टानों को तोडकर नदी का प्रवाह अपना मार्ग बना लेता है और पत्थरों को चीर के पीपल अपनी जडें जमा लेता है वैसे ही वे दुष्प्रचार के उस कलिकालमय वातावरण में भी सत्प्रचार की सुवास फैलाने में सफल हो गये । एक-एक करके निंदक-टोली के मुखिया के सभी साथियों ने उसका साथ छोड दिया और आखिर वह अकेला पड गया । पूरे क्षेत्र में उन महात्मा के नाम की जयजयकार होने लगी । उस दुरात्मा को अपने किये पर पश्चात्ताप होने लगा । वह जाकर उन महात्मा के श्रीचरणों में पड गया और अपने किये की माफी माँगते हुए गिडगिडाने लगा । महात्मा की करुणा पाकर वह उनका शिष्य बन गया और उसका पूरा जीवन ही परिवर्तित हो गया । चंदन अपनी महिमा में डट गया था, अब कुल्हाडी भी चंदन की सुवास महकाने लगी थी । उस क्षेत्र से विदाई की वेला में महात्मा के चेहरे पर मंद - मंद मुस्कान छलक रही थी और शिष्यों के हृदय में उमड रहा था गुरु - सिद्धांत की अजेयता का विलक्षण अनुभव !
देश, धर्म और संस्कृति का संरक्षण एवं पुनरुद्धार करनेवाले ऐसे महागुरु कभी - कभार धरती पर आते हैं और उनसे निभानेवाले सुशिष्य ही ऐसे दैवी कार्य के जागृत प्रहरी बन जाते हैं । सब कुछ सहते हुए सबका मंगल चाहने वाले इन्हीं के द्वारा समाजोद्धार का महत्कार्य सम्पन्न होता रहता है । पर कृतकृत्य तो वही समाज हो पाता है जो उन्हें समझ पाता है जीवित महापुरुष की हयाती में ही उनसे लाभ ले पाता है । अन्यथा बाद में तो केवल पश्चात्ताप ही शेष रह जाता है।
साभार :- लोक कल्याण सेतु
Sunday, 21 August 2016
Ganesh Chaturthi
आज 21 अगस्त 2016 रविवार को सुबह 08:18 से संकष्ट चतुर्थी है। चंद्रोदय - रात्रि 9.21 मिनट पर।
विघ्न और मुसीबतें दूर करने के लिए :-
आज गणपतिजी का पूजन करें और रात को चन्द्रमा में गणपतिजी की भावना करके अर्घ्य दें और निम्न मंत्र बोलें :-
" ॐ गं गणपते नमः।"
" ॐ सोमाय नमः।"
