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Saturday, 26 June 2021

वटसावित्री पूर्णिमा

आज वटसावित्री पूर्णिमा के अवसर पर संतश्री आशारामजी बापू आश्रम, हरिद्वार में साध्वी रेखा दीदी के सत्संग का आयोजन किया गया । पूज्य बापूजी के संस्मरणों के साथ ही, भजनानंदी साधकों के अनुभवों का लाभ भी सभी को मिला । 

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Sunday, 7 June 2020

Bapuji Sandesh - Grahan

ध्यान देने व जप बढ़ाने के लिये पूज्य बापूजी का जोधपुर से संदेश:


🔹 तीन ग्रहण आ रहे हैं। दो चंद्रग्रहण व एक सूर्यग्रहण। इसलिये धरती पर भयंकर उत्पात होने की संभावना है। इस समय जप में लग जायें सब। 5 जून (चंद्रग्रहण), 21 जून (सूर्यग्रहण) और 5 जुलाई (चंद्रग्रहण)। भाइयों के आश्रम व महिला आश्रम में खबर कर देना। एक महीने में तीन ग्रहण होना भारी खतरा है।


🔹 पिछला चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण कोरोना देकर गया। यह (5 जून को) आने वाला चन्द्रग्रहण इतना भयंकर नहीं रहेगा। (21 जून को) आने वाला सूर्यग्रहण तीसरा विश्वयुद्ध ला सकता है।


🔹 नोट : भारत में केवल 21 जून के सूर्यग्रहण का प्रभाव रहेगा। 5 जून और 5 जुलाई का चंद्रग्रहण भारत में नहीं दिखेगा, उसका प्रभाव विदेश में रहेगा। इसलिए 5 जून और 5 जुलाई को ग्रहण के नियमों का पालन नहीं करना है, पर जप तीनों ग्रहण के दिन करना है। इस संदेश से भयभीत नहीं होना है, जप में लगना है।


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Friday, 28 April 2017

Akshaya Tritiya - अक्षय फलदायी - अक्षय तृतीया

अक्षय फलदायी "अक्षय तृतीया" - 
28 अप्रैल (सुबह 10.29 से 29 अप्रैल सुबह 6.55 तक)।

अक्षय तृतीया के दिन स्नान, होम, जप, दान आदि का अनंत फल है, इसलिए भारतीय संस्कृति में इसका बड़ा महत्व है। माना जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन ही पीतांबरा, नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम के अवतार हुए हैं, इसीलिए इस दिन इनकी जयंती भी मनाई जाती हैे। इसके अतिरिक्त इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल होता है। अक्षय यानी जिसका कभी क्षय न हो या जो कभी नष्ट न हो। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है किंतु वैशाख मास की यह तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।

Monday, 12 December 2016

The Existence Of GOD

Belief  in the  Existence of GOD shows that one is searching for truth.  Truth is that which is unborn, immortal and remains unchanged in the past, present and future. To know it, one needs to purify one’s thoughts, speech and actions. Purification is of utmost importance because only through a purified mind can an aspirant think clearly and contemplate deeply. Once we are sincerely determined to search for the truth and fully committed to self – purification, we are certain to find the way and reach our goal. Truth itself becomes our guide and we find ourselves on the right path.

Truth is the Divine Force which dwells in every individual’s heart. It is the all-pervading, eternal reality joining one individual to another and linking all existence in one Divine awareness. That Divine Force is called GOD. One who believes in and surrenders himself to GOD attains freedom here and now. He knows that he belongs to GOD---and  God belongs to him. His awareness shifts from the world to GOD and he lives a life free from insecurity and fear. He has an unshakable faith in Divine protection. The scriptures constantly remind us that just as the ocean accepts a river and makes it its own, so GOD receives all who sincerely seek the DIVINE. It does not matter which path they follow or from which background they come. The only requirement is a desire to know the truth. Once the desire is awakened, all means and resources come together. Water finds its own level; likewise, a true lover of GOD finds GOD. The highest philosophy is to know that truth and GOD are one and the same and the highest practice is to search for truth through one’s thoughts, speech and action. 

Monday, 5 December 2016

Satsang Discourse - जिसने सत्य को जान लिया

एक बार भारतवर्ष में एक सभा में व्याख्यान देते हुए स्वामी रामतीर्थ को ऐसे विषय  पर बोलना पड़ा जिसमें राजनीति की गंध आ रही थी। श्रोताओं में न्यायाधीश, वकील और बड़े उच्च पद वाले सरकारी कर्मचारी भी थे। व्याख्यान के बाद वे स्वामीजी के पास आकर यह कहते हुए प्रतिवाद करने लगे कि, "स्वामीजी! भविष्य  में ऐसा व्याख्यान कभी न दीजिये क्योंकि भय है कि आपका शरीर कारागृह में डाल दिया जायेगा या फाँसी पर लटका दिया जायेगा।"
इस पर स्वामी रामतीर्थ ने उत्तर दिया, "प्रियवरों! राम जूडास इसकेरियट(Judas Iscariot) का काम नहीं कर सकता। राम सत्य के ईसामसीह को चाँदी के तीस टुकड़ों के पीछे नहीं बेच सकता क्योंकि कोई व्यक्ति राम को यह निश्चय नहीं करा सकता कि इस संसार में ऐसी भी तेज़ तलवार है जो आत्मा को काट सके या ऐसा तीक्ष्ण शस्त्र भी कोई है जो राम को घायल कर सके। अमर वस्तु,अविनाशी आत्मा, कभी ना उत्पन्न होने वाला, ना ही कभी मारे जाने योग्य, कल और आज सदैव एक समान रहने वाला यह राम है, तो फिर राम उनकी बात कैसे मानता?"   
सत्य और धर्म की राह पर चलने वाले हर महापुरुष को कठोर यातनायेँ व घोर कष्ट सहने पड़े परन्तु उन्होने अपना मार्ग ना बदला। वर्तमान समय में भी अपने हिन्दू धर्म व भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिये घोर कष्ट झेलने वाले परम पूज्य संतश्री आशारामजी बापू भी कहते हैं :-
" हमें मिटा सके यह जमाने में दम नहीं,
   हमसे है जमाना, जमाने से हम नहीं।"
जिसने सत्य को जान लिया,अपने आप को पहचान लिया कौन है जो उसका कुछ बिगाड़ पाये?

Thursday, 1 December 2016

Prernamurti in Mumbai

"कबीरा कलयुग आ गया झर-झर पड़े अंगार,
संत ना होते जगत में तो जल मरता संसार।"

 

परम पूज्य भारती श्रीजी का सत्संग आज (1st दिसम्बर) शाम 5 बजे से गोरेगांव आश्रम, मुंबई में। सभी अवश्य लाभ लें।

 

Sunday, 25 September 2016

Indira Ekadashi

इंदिरा एकादशी

26 सितम्बर - इंदिरा एकादशी के व्रत से बडे - बडे पापों का नाश होता है तथा नीच योनि में पडे हुए पितरों की सदगति हो जाती है।

युधिष्ठिर ने पूछा : हे मधुसूदन ! कृपा करके मुझे यह बताइये कि आश्विन के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है?

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आश्विन (गुजरात/महाराष्ट्र के अनुसार भाद्रपद) के कृष्णपक्ष में ‘इन्दिरा’ नाम की एकादशी होती है । उसके व्रत के प्रभाव से बड़े - बड़े पापों का नाश हो जाता है । नीच योनि में पड़े हुए पितरों को भी यह एकादशी सदगति देने वाली है।

राजन् ! पूर्वकाल की बात है । सत्ययुग में इन्द्रसेन नाम से विख्यात एक राजकुमार थे, जो माहिष्मतीपुरी के राजा होकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे । उनका यश सब ओर फैल चुका था । राजा इन्द्रसेन भगवान विष्णु की भक्ति में तत्पर हो गोविन्द के मोक्षदायक नामों का जप करते हुए समय व्यतीत करते थे और विधिपूर्वक अध्यात्मतत्त्व के चिन्तन में संलग्न रहते थे । एक दिन राजा राजसभा में सुखपूर्वक बैठे हुए थे इतने में ही देवर्षि नारद आकाश से उतरकर वहाँ आ पहुँचे । उन्हें आया हुआ देख राजा हाथ जोड़कर खड़े हो गये और विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें आसन पर बिठाया । इसके बाद वे इस प्रकार बोले: “ मुनिश्रेष्ठ ! आपकी कृपा से मेरी सर्वथा कुशल है । आज आपके दर्शन से मेरी सम्पूर्ण यज्ञ क्रियाएँ सफल हो गयीं । देवर्षे ! अपने आगमन का कारण बताकर मुझ पर कृपा करें।“

नारदजी ने कहा : नृपश्रेष्ठ ! सुनो । मेरी बात तुम्हें आश्चर्य में डालनेवाली है । मैं ब्रह्मलोक से यमलोक में गया था । वहाँ एक श्रेष्ठ आसन पर बैठा और यमराज ने भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की । उस समय यमराज की सभा में मैंने तुम्हारे पिता को भी देखा था । वे व्रतभंग के दोष से वहाँ आये थे । राजन् ! उन्होंने तुमसे कहने के लिए एक सन्देश दिया है, उसे सुनो । उन्होंने कहा है: ‘बेटा ! मुझे ‘इन्दिरा एकादशी’ के व्रत का पुण्य देकर स्वर्ग में भेजो ।’ उनका यह सन्देश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ । राजन् ! अपने पिता को स्वर्गलोक की प्राप्ति कराने के लिए ‘इन्दिरा एकादशी’ का व्रत करो ।

राजा ने पूछा : भगवन् ! कृपा करके ‘इन्दिरा एकादशी’ का व्रत बताइये । किस पक्ष में, किस तिथि को और किस विधि से यह व्रत करना चाहिए ।

नारदजी ने कहा : राजेन्द्र ! सुनो । मैं तुम्हें इस व्रत की शुभकारक विधि बतलाता हूँ । आश्विन मास के कृष्णपक्ष में दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धायुक्त चित्त से प्रातःकाल स्नान करो । फिर मध्याह्नकाल में स्नान करके एकाग्रचित्त हो एक समय भोजन करो तथा रात्रि में भूमि पर सोओ । रात्रि के अन्त में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन दातुन करके मुँह धोओ । इसके बाद भक्तिभाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करो :-

“ अघस्थित्वा निराहारः सर्वभोग विवर्जितः।
  श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥“

"कमलनयन भगवान नारायण ! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करुँगा । अच्युत ! आप मुझे शरण दें |"

इस प्रकार नियम करके मध्याह्नकाल में पितरों की प्रसन्नता के लिए शालिग्राम शिला के सम्मुख विधिपूर्वक श्राद्ध करो तथा दक्षिणा से ब्राह्मणों का सत्कार करके उन्हें भोजन कराओ । पितरों को दिये हुए अन्नमय पिण्ड को सूँघकर गाय को खिला दो । फिर धूप और गन्ध आदि से भगवान ह्रषिकेश का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करो । तत्पश्चात् सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुनः भक्तिपूर्वक श्रीहरि की पूजा करो । उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर भाई, बन्धु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करो ।

राजन् ! इस विधि से आलस्यरहित होकर यह व्रत करो । इससे तुम्हारे पितर भगवान विष्णु के वैकुण्ठधाम में चले जायेंगे । भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! राजा इन्द्रसेन से ऐसा कहकर देवर्षि नारद अन्तर्धान हो गये । राजा ने उनकी बतायी हुई विधि से अन्त: पुर की रानियों, पुत्रों और भृत्यों सहित उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया ।

कुन्तीनन्दन ! व्रत पूर्ण होने पर आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी । इन्द्रसेन के पिता गरुड़ पर आरुढ़ होकर श्रीविष्णुधाम को चले गये और राजर्षि इन्द्रसेन भी निष्कण्टक राज्य का उपभोग करके अपने पुत्र को राजसिंहासन पर बैठाकर स्वयं स्वर्गलोक को चले गये । इस प्रकार मैंने तुम्हारे सामने ‘इन्दिरा एकादशी’ व्रत के माहात्म्य का वर्णन किया है  । इसको पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।

Saturday, 24 September 2016

25 September 2016 - रविपुष्यामृत योग

रविवार, 25 सितंबर 2016 - रविपुष्यामृत योग (दोपहर 2:37 से  26 सितंबर सूर्योदय तक।)

रविवार के साथ पुष्य नक्षत्र का संयोग "रविपुष्यामृत योग" कहलाता है। यह योग मंत्र सिद्धि व औषध-प्रयोग के लिये विशेष फलदायी है। इस योग में किया गया जप, तप, ध्यान, दान महाफलदायी होता है।

Saturday, 17 September 2016

Power of Mansik Jap

मानसिक जप, वाचिक से हजार गुना प्रभावशाली होता है तथा जापक को अत्यंत शक्तिशाली बना देता है। अतः गुरुमन्त्र सतत जपते रहना चाहिये।

जप का अर्थ केवल माला के मनके घुमाना ही नहीं होता। मंत्र के अर्थ में डूब कर जप करने से वह हृदय में प्रवेश कर जाता है और जापक को आनन्द का अनुभव होता है।

Sunday, 11 September 2016

Power of Satsang

"खिला-पिला के देह बढाई वह भी अग्नि में जलाना है,
कर सत्संग अभी से प्यारे नहीं तो फिर पछताना है।"

गुरु की सेवा साधू जाने, गुरु सेवा क्या मूढ़ पिछाने।

गुरु के प्रति अदा की हुई सेवा आध्यात्मिक टॉनिक है। उससे मन व हृदय दैवी गुणों से भरपूर होते हैं, पुष्ट होते हैं। सन्त कहते भी हैं, " गुरु की सेवा साधू जाने, गुरु सेवा क्या मूढ़ पिछाने।"

ईमानदारी पूर्वक सच्चे हृदय से की गयी सेवा अक्षय फल देती है। दूसरों को नीचा दिखाने के लिये की गयी सेवा अथवा द्वेषपूर्ण सेवा हृदय की अशांति उत्पन्न करती है। कपट रहित सेवा सौभाग्य के द्वार खोल देती है।

Wednesday, 7 September 2016

Pearls Of Wisdom by H. H. Asharam Bapu Ji

सदगुरुदेव के प्रति सदैव ईश्वरभाव रखें। स्वप्न में भी दोषदृष्टि ना करें।

Friday, 2 September 2016

Food for Thought by H. D. H. Asharam Bapu Ji

सही और गलत का भेद सत्संग ही सिखाता है। अतः सत्संग का त्याग कभी नहीं करना चाहिये।

Thursday, 1 September 2016

Good Habits - Before Going to Bed

A Child can learn all good Techniques or good Sanskaars of life in "Bal Sanskaar Kendra", an initiative by #AsharamBapuJi.

Why To Run " Bal Sanskar Kendra " ?

The real way to fortify the true grandeur of a family, society or nation is to embolden the children and students thereof.

Childhood is the time when seeds of good character can be easily sown as children’s minds are clear, unbiased and impressionable.

" कलियाँ महके बनके फूल ! संस्कार बनते जीवन का मूल!!"

The objective of Bal Sanskaar Kendra is All - Round Development of The Children and The Nation.

- Param Pujya Sant Sri Asharam Ji Bapu

Tuesday, 30 August 2016

Satsang - Association with the Divine

In the Bhagwat, Bhagwan Krishna says - "O Udhava! Neither yoga nor knowledge, nor the recitation of scriptures, nor even austerities or renunciation or social service or charities or worship or learning, neither going to holy places, nor controlling the senses leads one to me as easily or as speedily as through SATSANG or through the association of the holy men."

Monday, 29 August 2016

If not in Human Birth then WHEN?

Food for Thought by H. D. H. Asharam Bapu Ji

"Silence your mind and listen the Divine Voice...OM"

Monday, 22 August 2016

जब कुल्हाड़ी भी चंदन की सुवास महकाने लगी

एक व्यक्ति देश, धर्म, संस्कृति और संतों की खूब निंदा करता था। उसने अपनी टोली बना ली थी एवं भगवद्भक्तों, सज्जनों को व्यर्थ ही सताता था। यदि किसी को तामसी प्रकृति कैसी होती है यह देखना हो तो बस उसी को देख ले। राक्षसी एवं मोहिनी प्रकृति का मानो वह मूर्तिमान स्वरूप था। एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ विचरण करते हुए उस क्षेत्र में पहुँचे । त्राहिमाम्……त्राहिमाम् पुकार रहे लोगों ने उन्हें अपनी व्यथा बतायी । महात्मा अपने शिष्यों से बोले :

‘‘ऋषिकुमारो ! मैंने तुम्हें जो शिक्षा दी है, उसको व्यवहार में लाने का समय अब आ गया है । तुम लोग मिलकर इन लोगों की व्यथा दूर करो।“

शिष्य उस क्षेत्र में जाकर सत्प्रचार करने लगे परंतु वे जहाँ भी जाते निंदकों की टोली के लोग नशा करके वहाँ आ जाते और उन्हें गालियाँ देते, अनर्गल वचन बोलते, यहाँ तक कि पत्थर भी मारते । कुछ ही दिनों में सभी शिष्य वापस आये और महात्मा से बोले : ‘‘गुरुजी ! हमने खूब प्रयास किये मगर निंदकों की वह टोली और उनका वह मुखिया... मानो हमारे धैर्य की परीक्षा लेने की ठान बैठे हों । वे सर्वहितकारी सनातन संस्कृति की जडें उखाडने का प्रण ले बैठे हैं।“

महात्मा बोले : ‘‘मैंने तुम्हें चंदन बनने की शिक्षा दी है । जो कुल्हाडी चंदन को काटती है, वह भी समय पाकर सुगंधित हो जाती है । कंचन की ही अग्नि - परीक्षा ली जाती है । धैर्य की कठिन कसौटी पर खरे उतरनेवालों को ही ‘धीर’ पद (अडिग आत्मपद) की प्राप्ति होती है । जब वे लोग बुराई का मार्ग नहीं छोड रहे हैं तो तुम भलाई का मार्ग बीच में ही छोडकर वापस कैसे आ गये ? क्या कभी बुराई भलाई से अधिक बलशाली हो सकती है ? आर्यवीरों ! मुझे विश्वास है  दृढता के मामले में तुम उनसे कदापि कम नहीं साबित हो सकते ! अपनी महिमा में जागो !”

शिष्यों की अंतरात्मा जागृत हुई । वे आपस में चर्चा करने लगे कि ‘‘एक अकेले निगुरे व्यक्ति और उसकी टोली में ऐसी दृढता हो सकती है तो ऐसे महान गुरु के हम शिष्यों में कितनी होनी चाहिए ! हमारे गुरुदेव ने कितनों का जीवन परिवर्तित किया है तो हम उनके सिद्धांतों की ध्वजा ऐसे क्षेत्र में भी क्यों नहीं फहरा सकते! अब हमें सफलता पाने तक मैदान नहीं छोडना है।"

“ बाधाएँ कब बाँध सकी हैं पथ पे चलनेवालों को।
विपदाएँ कब रोक सकी हैं आगे बढने वालों को।।“

वे दोबारा उस क्षेत्र में गये और वहाँ देहभान भूलकर, निर्भय हो कर ऐसे तो अपने गुरु के सिद्धांत के सत्प्रचार में जुट गये मानो सिद्धांतमय हो गये । जैसे चट्टानों को तोडकर नदी का प्रवाह अपना मार्ग बना लेता है और पत्थरों को चीर के पीपल अपनी जडें जमा लेता है वैसे ही वे दुष्प्रचार के उस कलिकालमय वातावरण में भी सत्प्रचार की सुवास फैलाने में सफल हो गये । एक-एक करके निंदक-टोली के मुखिया के सभी साथियों ने उसका साथ छोड दिया और आखिर वह अकेला पड गया । पूरे क्षेत्र में उन महात्मा के नाम की जयजयकार होने लगी । उस दुरात्मा को अपने किये पर पश्चात्ताप होने लगा । वह जाकर उन महात्मा के श्रीचरणों में पड गया और अपने किये की माफी माँगते हुए गिडगिडाने लगा । महात्मा की करुणा पाकर वह उनका शिष्य बन गया और उसका पूरा जीवन ही परिवर्तित हो गया । चंदन अपनी महिमा में डट गया था, अब कुल्हाडी भी चंदन की सुवास महकाने लगी थी । उस क्षेत्र से विदाई की वेला में महात्मा के चेहरे पर मंद - मंद मुस्कान छलक रही थी और शिष्यों के हृदय में उमड रहा था गुरु - सिद्धांत की अजेयता का विलक्षण अनुभव !

देश, धर्म और संस्कृति का संरक्षण एवं पुनरुद्धार करनेवाले ऐसे महागुरु कभी - कभार धरती पर आते हैं और उनसे निभानेवाले सुशिष्य ही ऐसे दैवी कार्य के जागृत प्रहरी बन जाते हैं । सब कुछ सहते हुए सबका मंगल चाहने वाले इन्हीं के द्वारा समाजोद्धार का महत्कार्य सम्पन्न होता रहता है । पर कृतकृत्य तो वही समाज हो पाता है जो उन्हें समझ पाता है जीवित महापुरुष की हयाती में ही उनसे लाभ ले पाता है । अन्यथा बाद में तो केवल पश्चात्ताप ही शेष रह जाता है।

साभार :- लोक कल्याण सेतु

Saturday, 6 August 2016

GuruBhaktiYog by H. D. H. Asharam Bapu Ji

अगर आप सांसारिक मनोवृति वाले लोगों का संग करेंगे तो आपको सांसारिक लोगों के गुण मिलेंगे। इसके विपरीत, जो सदैव परम सुख में निमग्न रहते हैं, सर्वगुणों के धाम हैं, जो साक्षात प्रेमस्वरूप हैं - ऐसे सद्गुरु के चरणकमलों की सेवा करेंगे तो आपको उनके गुण प्राप्त होंगे। तमाम दुर्गुणों को निर्मूल करने का एकमात्र प्रभावशाली उपाय है - "गुरुभक्तियोग" का आचरण।

Monday, 1 August 2016

Masik Shivratri at Haridwar

कल 1 अगस्त - मासिक शिवरात्रि व श्रावणी सोमवार :

जिस तिथि का जो स्वामी हो उसकी तिथि में आराधना-उपासना करना अतिशय उत्तम होता है । चतुर्दशी के स्वामी भगवान शिव हैं । अतः उनकी रात्रि में किया जानेवाला यह व्रत ‘शिवरात्रि' कहलाता है । प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रात्रि में  गुरु से प्राप्त हुए मंत्र का जप करें । गुरुप्रदत्त मंत्र न हो तो पंचाक्षर (नमः शिवाय) मंत्र के जप से भगवान शिव को संतुष्ट करें ।

प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रात्रि में गुरु से प्राप्त हुए मंत्र का जप करें । गुरुप्रदत्त मंत्र न हो तो पंचाक्षर (नमः शिवाय) मंत्र के जप से भगवान शिव को संतुष्ट करें ।

मासिक शिवरात्रि
प्रति वर्ष में एक महाशिवरात्रि आति है और हर महीने में एक मासिक शिवरात्रि आती है । उस दिन शाम को बराबर सूर्यास्त हो रहा हो उस समय एक दिया पर पाँच लंबी बत्तियाँ अलग-अलग उस एक में हो शिवलिंग के आगे जला के रखना बैठ कर भगवान शिवजी के नाम का जप करना प्रार्थना कर ना इससे व्यक्ति के सिर पे कर्जा हो तो जल्दी उतरता है आर्थिक परेशानियाँ दूर होती है ।

आर्थिक परेशानी से बचने हेतु हर महीने में शिवरात्रि (मासिक शिवरात्रि-कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी) को आती है । तो उस दिन जिसके घर में आर्थिक कष्ट रहते है वो शाम के समय या संध्या के मसय जप-प्रार्थना करें एवं शिवमंदिर में दीप-दान करे । और रात को जब 12 बजे जायें तो थोड़ी देर जाग कर जप और एक श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें । तो आर्थिक परेशानी दूर हो जायेगी ।

हर मासिक शिवरात्रि को सूर्यास्त के समय घर में बैठकर अपने गुरुदेव का स्मरण करके शिवजी का स्मरण करते-करते ये 17 मंत्र बोलें, जिनके सिर पर कर्जा ज्यादा हो, वो शिवजी के मंदिर में जाकर दिया जलाकर ये 17 मंत्र बोले । इससे कर्जा से मुक्ति मिलेगी...

1).  ॐ नमः शिवाय नमः
2). ॐ सर्वात्मने नमः
3). ॐ त्रिनेत्राय नमः    
4). ॐ हराय नमः
5). ॐ इर्न्द्मखाय नमः  
6). ॐ श्रीकंठाय नमः
7). ॐ सद्योजाताय नमः
8). ॐ वामदेवाय नमः
9). ॐ अघोरर्ह्द्याय नमः
10). ॐ तत्पुरुषाय नमः
11). ॐ ईशानाय नमः    
12). ॐ  अनंतधर्माय नमः
13). ॐ ज्ञानभूताय नमः 
14). ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नमः
15). ॐ प्रधानाय नमः  
16). ॐ व्योमात्मने नमः
17). ॐ युक्तकेशात्मरुपाय नमः

-श्री सुरेशानंन्दजी

Monday, 25 July 2016

भगवान के नाम का आश्रय

संत महापुरुष कहते हैं कि ईश्वर दर्शन की यदि अभिलाषा हो तो भगवान के नाम में विश्वास तथा पाप – पुण्य का भेद विचार रखकर चलना चाहिये। ज्ञान, अज्ञान, भूलवश या जानकर किसी भी प्रकार से भगवान के नाम का उच्चारण किया जाये तो उसका फल अवश्य मिलता है। बल्ब  का कार्य है कि वह सब को प्रकाश देता है अब चाहे कोई उसके प्रकाश में चोरी करे या श्रीमद् भागवत का पाठ करे,चाहे कोई भोजन बनाये या नंगा होकर नाचे इससे बल्ब को क्या? वह गुण – दोष से परे है उसका काम है प्रकाश देना। ऐसे ही कोई भगवान के नाम का आश्रय लेकर मुक्ति चाहता है और कोई ठगी या जालसाजी करता है तो इसमें भगवान का क्या दोष? फल तो उसे मिलेगा ही।