Tuesday, 4 October 2016

4 October - Mangalwari Chaturthi

4 अक्टूबर- मंगलवारी चतुर्थी (दोपहर 12.37 से 5 अक्टूबर सूर्योदय तक)

 

समस्त पुण्य कर्मों का, सूर्यग्रहण के समान फल देने वाली, इस तिथि का अवश्य लाभ लें।

 
 

Glimpses of Self Realization Diwas at AshramHaridwar

जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि है - "आत्म - साक्षात्कार"।

 

संत श्री आशारामजी बापू आश्रम, हरिद्वार में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया पूज्य बापूजी का 53वां "आत्म - साक्षात्कार दिवस"।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 

Saturday, 1 October 2016

2 October - Atma Sakshatkar

2 अक्टूबर - संतश्री आशारामजी बापू आत्म साक्षात्कार दिवस

 

ऐसा होता है आत्मसाक्षात्कार - पूज्य बापूजी

 

आत्मसाक्षात्कार मतलब क्या ?

आत्मसाक्षात्कार मतलब जो सत् है, चित् है, आनंद है और साक्षात् है | कल्पित ‘मैं – मेरा’ ज्ञान द्वारा उड़ जाये और जो वास्तविक है, साक्षात् है, उसी में अपने ‘मैं’ का साक्षात्कार करोगे तो इनका अस्तित्व और अपने ‘मैं’ का अस्तित्व सब एकरूप दिखेगा | अर्जुन ने पूछा था : " स्थितप्रज्ञस्य का भाषा ...."
भगवान् श्रीकृष्ण बोले : " प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ ....."

 

‘हे अर्जुन ! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है |’ ( गीता :२.५५ )

 

बोले फिर तो जड़ हो जायेगा | नहीं, वह चैतन्य हो जायेगा ! आत्मसाक्षात्कार के बाद जड़ नहीं होता | जीवन जीने का मजा तो आत्मसाक्षात्कार के बाद ही आता है, अन्यथा तो बैलगाड़ियों में बँधे बैल की तरह मजदूरी करके मरना है | साक्षात्कारी पुरुष की हाजरी मात्र से वातावरण आनंदित हो जाता है | जो श्रीकृष्ण में चम – चम चमकता है, भगवान शिव में समाधि – सुख देता है, माँ जगदम्बा में आदि शक्ति रूप से उभरता है, वही साँई लीलाशाहजी बापू में ज्ञान देता है और आशाराम में छुपा हुआ जागृत होता है, उसका नाम है आत्मसाक्षात्कार | यदि कोई केवल तीन मिनट के लिए आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में स्थित हो जाय तो उसका दुबारा जन्म नहीं होता, वह सदा के लिए जन्म - मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है| अरे ! मुक्त क्या होता है उसका यह अनुभव हो जाता है :-

 

" मुझे मेरी मस्ती कहाँ ले के आयी, जहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नहीं है |
पता जब चला मेरी हस्ती का मुझको, सिवा मेरे अपने कहीं कुछ नहीं है ||"

 

अपने भूतकाल को याद कर – करके विचारों के जाल में कब तक फँसते रहोगे ? मन की मान्यताओं में कब तक उलझते रहोगे ? सब बंधनों को काटकर उठ खड़े हो, मुक्त हो जाओ | शरीर एवं मन के किले को छोडकर आत्मा के आकाश में विहार करो | ऐसा ज्ञान पा लो कि तुम जीते - जी ही काल से परे हो जाओ और काल सिर कूटता रह जाय | ऐसा ज्ञान पाना कठिन नहीं है किंतु लोगों को अज्ञान को छोड़ने में, अपनी मान्यताओं को तोड़ने में कठिनाई लगती है | अज्ञान और मान्यताओं में बहने की बेवकूफी सदियों की है अत: उसे छोड़ना कठिन लगता है| नहीं तो ईश्वर को पाने में क्या कठिनाई है ! ईश्वर तो अपना आत्मस्वरूप है |

 

आप बस अपना उद्देश्य बना लो !

ईश्वरप्राप्ति में जो सुख है और समाज का भला है उसकी बराबरी में कुछ नहीं है | अपने स्वरूप का, अपने आत्मा का पता चल जाना यह बड़े – में – बड़ी उपलब्धि है | इसके अतिरिक्त जगत की सारी उपलब्धियाँ दिखनेमात्र की हैं | ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में रोना ही पड़ेगा | भगवान को पाने की महत्ता समझ में आ जाये और भगवान को पाने का इरादा पक्का हो जाये तो आपकी ९५ प्रतिशत साधना हो गयी ! बाकी ५ प्रतिशत में ३ प्रतिशत आपकी भावना, श्रद्धा और २ प्रतिशत आपकी साधना | केवल उद्देश्य बना लो ईश्वरप्राप्ति का | बस हो गया.........।

 

“ पूर्ण गुरु कृपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।
आसुमल से हो गये, साईं आशाराम।।“

Thursday, 29 September 2016

Pearls of Wisdom by H. H. Asharam Bapu Ji

जिस समाज में जितना सत्संग और संत सान्निध्य होता है, वह समाज उतना ही प्रभावशाली व उन्नत होता है। सादगी, सच्चाई व संयम से जीने से मनोबल बढ़ता है और आभा भी बढ़ती है। जीवन दिव्य हो जाता है। यह दिव्यता सत्संग ही लाता है।

Tuesday, 27 September 2016

Sarvapitri Amavasya - 30-09-2016 @ AshramHaridwar

संत श्री आशारामजी बापू आश्रम, हरिद्वार में

सर्वपित्री अमावस्या पर सामूहिक श्राद्ध 

दिनाँक -30 सितम्बर 2016 समय - प्रात: 9 बजे से।

 

"अपने पितरों के दिवंगत होने की जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना चाहिये। यदि दिवंगत की तिथि याद न हो तो उनके श्राद्ध के लिये अमावस्या (सर्वपित्री) की तिथि उपयुक्त मानी गयी है।"


इस तिथि का लाभ लेने के लिये 28 सितम्बर तक अपना पंजीकरण अवश्य करायें।... सम्पर्क :- 09997008832, 09359508387

Sunday, 25 September 2016

Indira Ekadashi

इंदिरा एकादशी

26 सितम्बर - इंदिरा एकादशी के व्रत से बडे - बडे पापों का नाश होता है तथा नीच योनि में पडे हुए पितरों की सदगति हो जाती है।

युधिष्ठिर ने पूछा : हे मधुसूदन ! कृपा करके मुझे यह बताइये कि आश्विन के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है?

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आश्विन (गुजरात/महाराष्ट्र के अनुसार भाद्रपद) के कृष्णपक्ष में ‘इन्दिरा’ नाम की एकादशी होती है । उसके व्रत के प्रभाव से बड़े - बड़े पापों का नाश हो जाता है । नीच योनि में पड़े हुए पितरों को भी यह एकादशी सदगति देने वाली है।

राजन् ! पूर्वकाल की बात है । सत्ययुग में इन्द्रसेन नाम से विख्यात एक राजकुमार थे, जो माहिष्मतीपुरी के राजा होकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे । उनका यश सब ओर फैल चुका था । राजा इन्द्रसेन भगवान विष्णु की भक्ति में तत्पर हो गोविन्द के मोक्षदायक नामों का जप करते हुए समय व्यतीत करते थे और विधिपूर्वक अध्यात्मतत्त्व के चिन्तन में संलग्न रहते थे । एक दिन राजा राजसभा में सुखपूर्वक बैठे हुए थे इतने में ही देवर्षि नारद आकाश से उतरकर वहाँ आ पहुँचे । उन्हें आया हुआ देख राजा हाथ जोड़कर खड़े हो गये और विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें आसन पर बिठाया । इसके बाद वे इस प्रकार बोले: “ मुनिश्रेष्ठ ! आपकी कृपा से मेरी सर्वथा कुशल है । आज आपके दर्शन से मेरी सम्पूर्ण यज्ञ क्रियाएँ सफल हो गयीं । देवर्षे ! अपने आगमन का कारण बताकर मुझ पर कृपा करें।“

नारदजी ने कहा : नृपश्रेष्ठ ! सुनो । मेरी बात तुम्हें आश्चर्य में डालनेवाली है । मैं ब्रह्मलोक से यमलोक में गया था । वहाँ एक श्रेष्ठ आसन पर बैठा और यमराज ने भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की । उस समय यमराज की सभा में मैंने तुम्हारे पिता को भी देखा था । वे व्रतभंग के दोष से वहाँ आये थे । राजन् ! उन्होंने तुमसे कहने के लिए एक सन्देश दिया है, उसे सुनो । उन्होंने कहा है: ‘बेटा ! मुझे ‘इन्दिरा एकादशी’ के व्रत का पुण्य देकर स्वर्ग में भेजो ।’ उनका यह सन्देश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ । राजन् ! अपने पिता को स्वर्गलोक की प्राप्ति कराने के लिए ‘इन्दिरा एकादशी’ का व्रत करो ।

राजा ने पूछा : भगवन् ! कृपा करके ‘इन्दिरा एकादशी’ का व्रत बताइये । किस पक्ष में, किस तिथि को और किस विधि से यह व्रत करना चाहिए ।

नारदजी ने कहा : राजेन्द्र ! सुनो । मैं तुम्हें इस व्रत की शुभकारक विधि बतलाता हूँ । आश्विन मास के कृष्णपक्ष में दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धायुक्त चित्त से प्रातःकाल स्नान करो । फिर मध्याह्नकाल में स्नान करके एकाग्रचित्त हो एक समय भोजन करो तथा रात्रि में भूमि पर सोओ । रात्रि के अन्त में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन दातुन करके मुँह धोओ । इसके बाद भक्तिभाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करो :-

“ अघस्थित्वा निराहारः सर्वभोग विवर्जितः।
  श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥“

"कमलनयन भगवान नारायण ! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करुँगा । अच्युत ! आप मुझे शरण दें |"

इस प्रकार नियम करके मध्याह्नकाल में पितरों की प्रसन्नता के लिए शालिग्राम शिला के सम्मुख विधिपूर्वक श्राद्ध करो तथा दक्षिणा से ब्राह्मणों का सत्कार करके उन्हें भोजन कराओ । पितरों को दिये हुए अन्नमय पिण्ड को सूँघकर गाय को खिला दो । फिर धूप और गन्ध आदि से भगवान ह्रषिकेश का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करो । तत्पश्चात् सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुनः भक्तिपूर्वक श्रीहरि की पूजा करो । उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर भाई, बन्धु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करो ।

राजन् ! इस विधि से आलस्यरहित होकर यह व्रत करो । इससे तुम्हारे पितर भगवान विष्णु के वैकुण्ठधाम में चले जायेंगे । भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! राजा इन्द्रसेन से ऐसा कहकर देवर्षि नारद अन्तर्धान हो गये । राजा ने उनकी बतायी हुई विधि से अन्त: पुर की रानियों, पुत्रों और भृत्यों सहित उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया ।

कुन्तीनन्दन ! व्रत पूर्ण होने पर आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी । इन्द्रसेन के पिता गरुड़ पर आरुढ़ होकर श्रीविष्णुधाम को चले गये और राजर्षि इन्द्रसेन भी निष्कण्टक राज्य का उपभोग करके अपने पुत्र को राजसिंहासन पर बैठाकर स्वयं स्वर्गलोक को चले गये । इस प्रकार मैंने तुम्हारे सामने ‘इन्दिरा एकादशी’ व्रत के माहात्म्य का वर्णन किया है  । इसको पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।

Saturday, 24 September 2016

25 September 2016 - रविपुष्यामृत योग

रविवार, 25 सितंबर 2016 - रविपुष्यामृत योग (दोपहर 2:37 से  26 सितंबर सूर्योदय तक।)

रविवार के साथ पुष्य नक्षत्र का संयोग "रविपुष्यामृत योग" कहलाता है। यह योग मंत्र सिद्धि व औषध-प्रयोग के लिये विशेष फलदायी है। इस योग में किया गया जप, तप, ध्यान, दान महाफलदायी होता है।