Monday, 27 March 2017

Somvati Amavasya


२७ मार्च - सोमवती अमावस्या 

(सुबह 10:44 से 28 मार्च सूर्योदय तक)



इस दिन किया जाने वाला कोई भी शुभ कर्म जैसे जप, दान व मौनपूर्वक गंगास्नान, ध्यान, उपवास आदि अक्षय फलदायी होता है। शास्त्रों में यह अमावस्या दरिद्रता निवारक कही गयी है। तुलसीजी की 108 परिक्रमा व "श्रीहरि.....श्रीहरि......श्रीहरि" का जप करने से धन की कमी दूर होती है। अगर माला से जप कर रहे हैं तो एक मनके पर तीन बार "श्रीहरि" मंत्र का जप करने से जप पूरा माना जाता है ऐसा करके ही माला आगे घुमायेँ - पूज्य बापूजी

Thursday, 23 March 2017

Papmochani Ekadashi

२४ मार्च - पापमोचनी एकादशी




महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र (गुजरात / महाराष्ट्र के अनुसार फाल्गुन ) मास के कृष्णपक्ष की एकादशी के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की, तो वे बोले : ‘राजेन्द्र ! मैं तुम्हें इस विषय में एक पापनाशक उपाख्यान सुनाऊँगा, जिसे चक्रवर्ती नरेश मान्धाता के पूछने पर महर्षि लोमश ने कहा था ।’


मान्धाता ने पूछा : भगवन् ! मैं लोगों के हित की इच्छा से यह सुनना चाहता हूँ कि चैत्र मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है, उसकी क्या विधि है तथा उससे किस फल की प्राप्ति होती है? कृपया ये सब बातें मुझे बताइये ।


लोमशजी ने कहा : नृपश्रेष्ठ ! पूर्वकाल की बात है । अप्सराओं से सेवित चैत्ररथ नामक वन में, जहाँ गन्धर्वों की कन्याएँ अपने किंकरो के साथ बाजे बजाती हुई विहार करती हैं, मंजुघोषा नामक अप्सरा मुनिवर मेघावी को मोहित करने के लिए गयी । वे महर्षि चैत्ररथ वन में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करते थे । मंजुघोषा मुनि के भय से आश्रम से एक कोस दूर ही ठहर गयी और सुन्दर ढंग से वीणा बजाती हुई मधुर गीत गाने लगी । मुनिश्रेष्ठ मेघावी घूमते हुए उधर जा निकले और उस सुन्दर अप्सरा को इस प्रकार गान करते देख बरबस ही मोह के वशीभूत हो गये । मुनि की ऐसी अवस्था देख मंजुघोषा उनके समीप आयी और वीणा नीचे रखकर उनका आलिंगन करने लगी । मेघावी भी उसके साथ रमण करने लगे । रात और दिन का भी उन्हें भान न रहा । इस प्रकार उन्हें बहुत दिन व्यतीत हो गये । मंजुघोषा देवलोक में जाने को तैयार हुई । जाते समय उसने मुनिश्रेष्ठ मेघावी से कहा: ‘ब्रह्मन् ! अब मुझे अपने देश जाने की आज्ञा दीजिये ।’


मेघावी बोले : देवी ! जब तक सवेरे की संध्या न हो जाय तब तक मेरे ही पास ठहरो। अप्सरा ने कहा : विप्रवर ! अब तक न जाने कितनी ही संध्याएँ चली गयीं ! कृपा करके बीते हुए समय का विचार तो कीजिये !


लोमशजी ने कहा : राजन् ! अप्सरा की बात सुनकर मेघावी चकित हो उठे । उस समय उन्होंने बीते हुए समय का हिसाब लगाया तो मालूम हुआ कि उसके साथ रहते हुए उन्हें सत्तावन वर्ष हो गये । उसे अपनी तपस्या का विनाश करनेवाली जानकर मुनि को उस पर बड़ा क्रोध आया । उन्होंने शाप देते हुए कहा: ‘पापिनी ! तू पिशाची हो जा ।’ मुनि के शाप से दग्ध होकर वह विनय से नतमस्तक हो बोली : ‘विप्रवर ! मेरे शाप का उद्धार कीजिये । सात वाक्य बोलने या सात पद साथ -साथ चलने मात्र से ही सत्पुरुषों के साथ मैत्री हो जाती है । ब्रह्मन् ! मैं तो आपके साथ अनेक वर्ष व्यतीत किये हैं, अत: स्वामिन् ! मुझ पर कृपा कीजिये ।’


मुनि बोले : भद्रे ! क्या करुँ ? तुमने मेरी बहुत बड़ी तपस्या नष्ट कर डाली है। फिर भी सुनो। चैत्र कृष्णपक्ष में जो एकादशी आती है उसका नाम है ‘पापमोचनी।’ वह शाप से उद्धार करने वाली तथा सब पापों का क्षय करने वाली है । सुन्दरी ! उसी का व्रत करने पर तुम्हारी पिशाचता दूर होगी ।


ऐसा कहकर मेघावी अपने पिता मुनिवर च्यवन के आश्रम पर गये । उन्हें आया देख च्यवन ने पूछा : ‘बेटा ! यह क्या किया ? तुमने तो अपने पुण्य का नाश कर डाला !’


मेघावी बोले : पिताजी ! मैंने अप्सरा के साथ रमण करने का पातक किया है । अब आप ही कोई ऐसा प्रायश्चित बताइये, जिससे पातक का नाश हो जाय ।


च्यवन ने कहा : बेटा ! चैत्र कृष्णपक्ष में जो ‘पापमोचनी एकादशी’ आती है, उसका व्रत करने पर पापराशि का विनाश हो जायेगा ।


पिता का यह कथन सुनकर मेघावी ने उस व्रत का अनुष्ठान किया । इससे उनका पाप नष्ट हो गया और वे पुन: तपस्या से परिपूर्ण हो गये । इसी प्रकार मंजुघोषा ने भी इस उत्तम व्रत का पालन किया । ‘पापमोचनी’ का व्रत करने के कारण वह पिशाच योनि से मुक्त हुई और दिव्य रुपधारिणी श्रेष्ठ अप्सरा होकर स्वर्गलोक में चली गयी ।


भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! जो श्रेष्ठ मनुष्य ‘पापमोचनी एकादशी’ का व्रत करते हैं उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । इसको पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है । ब्रह्महत्या, सुवर्ण की चोरी, सुरापान और गुरुपत्नीगमन करने वाले महापातकी भी इस व्रत को करने से पापमुक्त हो जाते हैं । यह व्रत बहुत पुण्यमय है ।

Wednesday, 22 March 2017

"योगसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज"
२३ मार्च - अवतरण दिवस


"कुलं पवित्रं जननी कृतार्था, वसुन्धरा पुण्यवती च येन।"


"जिस कुल में महापुरुष अवतरित होते हैं वह कुल पवित्र, जिस माता के गर्भ से उनका जन्म होता है वह माता कृतार्थ एवं जिस जगह पर वे जन्म लेते हैं वह वसुन्धरा पुण्यशालिनी हो जाती है।"


बालक लीलाराम के बचपन की एक घटना है:-जिस गाँव में उनका जन्म हुआ था, वह महराब चांडाई नामक गाँव बहुत छोटा था। उस जमाने में दुकान में बेचने के लिए सामान टंडेबाग से लाना पड़ता था। उनके चाचा भाई लखुमल वस्तुओं की सूची एवं पैसे देकर बालक लीलाराम को खरीदी करने के लिए भेजते थे। एक समय मारवाड़ एवं थार में बड़ा अकाल पड़ा था। लखुमलजी ने पैसे देकर बालक लीलाराम को दुकान के लिए खरीदी करने को भेजा। लीलाराम खरीदी करके, माल-सामान की दो बैलगाड़ियाँ भरकर अपने गाँव लौट रहे थे। गाड़ियों में आटा, दाल, चावल, गुड़, घी आदि था। रास्ते में एक जगह पर गरीब, पीड़ित,अनाथ एवं भूखे लोगों ने लीलाराम को घेर लिया। दुर्बल एवं भूख से व्याकुल लोग जब अनाज के लिए गिड़गिड़ाने लगे तब लीलाराम का हृदय पिघल उठा। वे सोचने लगे, "इस माल को मैं भाई की दुकान पर ले जाऊँगा। वहाँ से खरीदकर भी मनुष्य ही खायेंगे न....! ये सब भी तो मनुष्य ही हैं। बाकी बची पैसे के लेन-देन की बात... तो प्रभु के नाम पर भले ये लोग ही खा लें।"


बालक लीलाराम ने बैलगाड़ियाँ खड़ी करवायीं और उन क्षुधापीड़ित लोगों से कहाः "यह रहा सब सामान। तुम लोग इसमें से भोजन बना कर खा लो।"


भूख से कुलबुलाते लोगों ने तो दोनों बैलगाड़ियों को तुरंत ही खाली कर दिया। लीलाराम भय से काँपते, थरथराते गाँव पहुँचे। खाली बोरों को गोदाम में रख दिया। कुँजियाँ चाचा लखुमल को दे दीं। 


लखुमलजी ने पूछाः"माल लाया?"


"हाँ।"


"कहाँ है?"


"गोदाम में।"


"अच्छा बेटा ! जा, तू थक गया होगा। सामान का हिसाब कल देख लेंगे।"


दूसरे दिन लीलाराम दुकान पर गये ही नहीं। उन्हें तो पता था कि गोदाम में क्या माल रखा है। वे घबराये, काँपने लगे। उनको काँपते हुए देखकर लखुमल ने कहाः "अरे ! तुझे बुखार आ गया? आज घर पर ही आराम कर।"


एक दिन.... दो दिन.... तीन दिन..... बालक लीलाराम बुखार के बहाने दिन बिता रहे हैं और भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं:-


"हे भगवान! अब तो तू ही जान। मैं कुछ नहीं जानता। हे करन-करावनहार स्वामी! तू ही सब कराता है। तूने ही भूखे लोगों को खिलाने की प्रेरणा दी। अब सब तेरे ही हाथ में है, प्रभु ! तू मेरी लाज रखना। मैं कुछ नहीं, तू ही सब कुछ है...."


एक दिन शाम को लखुमलजी अचानक लीलाराम के पास आये और बोलेः''लीला.... लीला ! तू कितना अच्छा माल लेकर आया है !"


लीलाराम घबराये। काँप उठे कि "अच्छा माल.... अच्छा माल कहकर अभी लखुमल मेरे कान पकड़कर मारेंगे।" वह हाथ जोड़कर बोलेः"मेरे से गलती हो गयी।"


"नहीं बेटा ! गलती नहीं हुई। मुझे लगता था कि व्यापारी तुझे कहीं ठग न लें। ज्यादा कीमत पर घटिया माल न पकड़ा दें किन्तु सभी चीजें बढ़िया हैं। पैसे तो नहीं खूटे ना?"


"नहीं, पैसे तो पूरे हो गये और माल भी पूरा हो गया।""माल किस तरह पूरा हो गया?"


बालक लीलाराम जवाब देने में घबराने लगे तो लखुमल ने कहाः "नहीं बेटा ! सब ठीक है। चल, तुझे बताऊँ।"


ऐसा कहकर लखुमलजी लीलाराम का हाथ पकड़कर गोदाम में ले गये। लीलाराम ने वहाँ जाकर देखा तो सभी खाली बोरे माल-सामान से भरे हुए मिले ! उनका हृदय भावविभोर हो उठा और गदगद होते हुए उन्होंने परमात्मा को धन्यवाद दियाः "प्रभु ! तू कितना दयालु है.... कितना कृपालु है !"


लीलाराम जी ने तुरंत ही निश्चय कियाः "जिस परमात्मा ने मेरी लाज रखी है.... गोदाम में बाहर से ताला होने पर भी भीतर के खाली बोरों को भर देने की जिसमें शक्ति है, अब मैं उसी परमात्मा को खोजूँगा..... उसके अस्तित्व को जानूँगा.... उसी प्यारे को अब अपने हृदय में प्रकट करूँगा।"


कैसे बने बालक लीलाराम से साईं लीलाशाहजी महाराज?


पढ़िये - "जीवन सौरभ"- साईं लीलाशाहजी महाराज की जीवनकथा।

Tuesday, 21 March 2017

निगुरा होता हिय का अँधा


निगुरा होता हिय का अन्धा, 
खूब करे संसार का धन्धा।
जम का बने मेहमान, 
निगुरे नहीं रहना


"One who is without a Guru is blind within. He remains engrossed in the worldly affairs and finally falls prey to YAMA. One should never remain without a SADGURU" 

Sunday, 19 March 2017

किसमें करें आस्था और किसका करें विवेक?

"किसमें करें आस्था और किसका करें विवेक?"
पूज्य संतश्री आशाराम बापूजी का एक और गहरा सत्संग। 
अवश्य सुनें :-


Thursday, 16 March 2017

संत आशारामजी बापू मामले पर बोले "ईशा फाउंडेशन" के सद्गुरु-जग्गी वासुदेव "मीडिया की भूमिका संदिग्ध।"


Arnab Goswami asks "Sadhguru" - Jaggi Vasudev to speak on Sant Shri Asharam Bapu Ji at Rotary Club's event, Delhi on 6th March 2017.

I have never met Asharam Bapu. I only saw him on the news channels. and.....I... I mean if law of the country is taking charge of it, it's not for me to make comments because I know the local media, where I live, in the last 25 years, they have been running certain segments, not everybody, certain segments of the media, you know I have stolen 7000 Kidneys, I killed over 100 elephants and I have destroyed an entire rain forest and anything that a man can do and cannot do I have done ok... so when this is happening to me, I don't want to comment about somebody, we don't know whats happening to them because in this country anybody can write anything, say anything because there is no way to fix them with law, there is no defamatory stuff that you can do and I am telling you mean stream television channels in TamilNadu have said I have stolen 7000 Kidneys. I said at least increase the number for my stature, at least make it 7 lacs or 70 lacs, why 7000... you are just degrading me and that guy comes, you know, journalist comes and asks me is it true that you are exporting Kidneys to America. I said no I am having for breakfast. so when I see this I don't want to comment on somebody because we don't know who is running for them...

Wednesday, 15 March 2017

Whom do you ruminate on within your heart?


Whom do you ruminate on within your heart? Whom do you think about in your mind? What is the first thought that comes to your mind when you wake up from your sleep in the middle of night?

Pujya Asharam Bapuji states in his discourses, "Watchfulness is the key to Sadhana. Be alert throughout the day, even while working, so as not to allow unsavoury thoughts or resolves to creep in for any rhyme or reason. Never be lenient towards any of your faults, shortcomings or depraved thinking. You must not overlook your vices rather do expiate them without fail by administering some sort of punishment on yourself."

He says, "Our actions themselves reflect whether pure and auspicious thoughts are increasing. If our behaviour and actions are becoming virtuous, our life is progressing towards Real Happiness."